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वेदामृत

“परोपकाराय पुण्याय पापाय पर पीडनम्।“
अर्थात् परोपकार सदैव पुण्य के लिए होता है और पाप सदा दूसरों को पीडा देने के लिए। परोपकार का अर्थ है दूसरों की भलाई करना। कोई व्यक्ति जीविकोपार्जन के लिए विभिन्न उद्यम करते हुए यदि दूसरे व्यक्तियों और जीवधारियों की भलाई के लिए कुछ प्रयत्‍‌न करता है तो ऐसे प्रयत्‍‌न परोपकार की श्रेणी में आते है।

योगामृत

“योगश्चित्वृयत्तिनिरोधः” प्रकृत सूत्र से महर्षि पतंजलि संकेत करते है कि - चित्त की वृत्तियों को यदि समाप्त करना है तो व्यक्ति को योग करना चाहिए। योगासन से व्यक्ति का शरीर सुन्दर एवं आकर्षक बनता है तथा उसका मन शीध्र एकाग्र होकर अध्ययन में लग जाता है। इसलिए विद्यार्थी के लिए योग अत्यन्त लाभकारी है। योग से व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का भी विकास होता है।

स्वस्थ्यवृत्तम्

संतुलित आहार कुछ ही दिन में आश्चर्यजनक परिणाम दे सकता है। इससे व्यक्ति का शरीर छरहरा तो बनता ही है, उसे स्फूर्ति और ताजगी का अहसास भी होता है। संतुलित आहार को अपना कर मोटापे से परेशान व्यक्ति अपनी कमर का मोटापा कई इंच कम कर सकते हैं और कमर के ऊपर तथा पेट पर अतिरिक्त चर्बी को कम कर सकते हैं।

परिचय

परम कारूणिक आचार्य प्रणवानन्द जो सात संस्थाओं के संस्थापक संचालक एवं संरक्षक हैं। जिनके सदय-हृदय में सदा विश्वबन्धुत्व की मधुरिमामयी उत्ताल तरंगें हिलोरे लेती रहती हैं, जिन्होने अपनाया अपने जीवन में वैदिक सन्देश ‘‘यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्’’ अर्थात् जहॉ समस्त भूमण्डल एक निवास स्थान (घौंसले) के रूप में परिवर्तित हो जाता है। उनके इन्हीं उदात्तविचारों की परिणति है ‘‘आचार्य प्रणवानन्द विश्वनीड-न्यास’’।

यह न्यास एवं इस न्यास के सभी न्यासी प्रेरणापुंजतपःपूत आचार्य प्रवर से पूनीत प्रेरणा प्राप्त करके आज समरसता से परिपूर्ण सकल संसार में सौहार्द उत्पन्न कर समस्त विश्व को युद्धों की विभीषिका से मुक्त कराना चाहते हैं। और चाहते हैं एक समुन्नत, समृद्ध, स्वस्थ, सुशान्त सशक्त, सुशील, सच्चरित सभ्य संसार, जो सम्पूर्ण सौमनस्य के साथ नवसृजनशील, सततश्रम से सम्पन्न समाज का नवनिर्माण कर सकें, तो आईये इस न्यास के साथ जुडकर सृजन के इन क्षणों को ऐतिहासिक बना दें, और दिखला दें अखिल विश्व को कि ‘‘सशक्त भूमण्डली करण क्या होता है? और बना दें एक महती मानवशृंखला जो विश्व को दिग् दिगन्त तक जोड़कर विश्वबन्धुत्व का एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत कर सके विश्व के आपदा ग्रस्त बन्धुओं की ओर हम अपना हाथ बढाना चाहते हैं। हम बॉटना चाहते हैं, उनका दर्द। मिटाना चाहते हैं, विश्व में प्रसृत कुरीतियों कुप्रथाओं और भयानक व्याधियों को, क्या आप भी हमारे साथ खड़ हैं? साथी हाथ बढाना………….।

विमर्श

प्राचीन शिक्षा पद्धत्ति पर संचालित गुरुकुल पौन्धा एवं इसका उत्सव – मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपनी आत्मा की उन्नति करे। आत्मा की उन्नति ज्ञान की प्राप्ति एवं तदवत् आचरण करने से होती है। शारीरिक उन्नति के पश्चात ज्ञान की प्राप्ति करना कर्तव्य है। सद्ज्ञान की प्राप्ति वेद व वैदिक शिक्षाओं को जानने वा पढ़ने से ही होती है। इसके साधन मुख्यतः गुरूकुलीय शिक्षा है जहां स्नातक बनकर ब्रह्मचारी वैदिक शास्त्रों को जानने व समझने की योग्यता प्राप्त कर लेता है….और पढ़ें

स्त्री व शूद्र शिक्षा के सन्दर्भ में सत्यार्थप्रकाश का मत— शिवदेव आर्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी अनिवार्य शिक्षा का समर्थन करते हैं और इसके लिए स्वामी जी यह दायित्व माता-पिता को सौंपते हैं। वे चाणक्य के उस प्रसिद्ध श्लोक – ‘माता शत्रुः पिता वैरी…’ को उद्धृत कर यह स्पष्ट कर देते हैं कि जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को प्रशिक्षित नहीं किया उन्होंने अपने सन्तानों के साथ शत्रुवत् व्यवहार किया है….और पढ़ें

आर्यसमाज का उद्देश्य संसार का उपकार करना मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून

मनुष्य समाज की एक इकाई है। मनुष्य का अभिप्राय स्त्री व पुरुष दोनों से होता है। इन दोनों के समूहों से मिल कर समाज बनता है। समाज का अर्थ होता कि सभी मनुष्य स्त्री व पुरुष परस्पर समान अथवा बराबर हैं। पृथिवी के किसी भूभाग पर समाज के द्वारा ही देश का निर्माण हुआ है…..और पढ़ें

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