गुरुकुल—अलीगढ़ (उ.प्र.)

५. श्रीकृष्ण आर्ष गुरुकुल (देवालय) गोमत, जिला-अलीगढ़, (उ.प्र.) -

अलीगढ़ की पवित्र भूमि एवं श्रीकृष्ण की विचरण स्थली ग्राम-गोमत में विलक्षण प्रतिभा के धनी एवं ब्रह्मनिष्ठ, तितिक्षु, संन्यासी परमपूज्य स्वामी शीतलदास जी महाराज ने आज से लगभग तीन-चार सौ वर्ष पूर्व हिन्दू आदर्शों एवं मूल्यों को स्थापित करने तथा गर्त में डूब चुके हमारे प्राचीन गौरवमयी इतिहास एवं धर्म और उससे सम्बन्धित समस्त पहलुओं को पुनः प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से श्री राधाकृष्ण मन्दिर देवालय की स्थापना की।

शीतलदास जी के कार्यों को, विचारों को उनके सुयोग्य शिष्य परम्परा में प्रट्टाल दास, नारायण दास, श्याम दास लक्ष्मी आदि में आगे बढ़ाया। वर्तमान में त्यागी तपस्वी विचार मुनि जी आगे बढ़ा रहे हैं। जो आदर्श मानव आचार संहिता के कट्टर समर्थक हैं।

सम्प्रति ‘सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्’ की भावना से विश्वकल्याण के लिए जीवन में कभी भी हतोत्साहित की भावना न उत्पन्ना करने वाली आर्ष शिक्षा पद्धति के माध्यम से विचार मुनि जी के व्यवस्थापकत्व तथा स्वामी प्रणवानन्द जी के संरक्षणत्व में एक गुरुकुल चल रहा है। जहाँ 60 विद्यार्थी विद्यालाभ पा रहे हैं। अतः वह प्राचीन मन्दिर आज श्रीकृष्ण आर्ष गुरुकुल (देवालय) गोमत अलीगढ़ के नाम से ख्याति को पा रहा है।

स्वामी श्रद्धानन्द जी द्वारा लगाया गया पौधा जिसे स्वामी जी ने गुरुकुल का नाम दिया एक विशाल वटवृक्ष की भाँति फैलता जा रहा है और सारे विश्व को प्रकाशमान् कर रहा है तथा आर्यजनों के प्रयास से इसकी शाखाएँ अनवरत फैलती ही जा रही हैं। श्रीकृष्ण आर्ष गुरुकुल (देवालय) गोमत का निर्माण भी इसी प्रयास की एक कड़ी है। यह संस्था श्रीमद्दयानन्द वेदार्ष महाविद्याल, न्यास गौतमनगर, नई दिल्ली-४९ से सम्बन्धित शाखा नं.-५ है।

देवभूमि भारतवर्ष की महिमामयी गोद में समय-समय पर अनेक महापुरुषों ने जन्म ग्रहण कर विश्व की विभ्रान्त मानवता को सत्यापथ का दर्शन करा धराधाम में गहन तिमिर को विदीर्ण कर ज्ञान का प्रकाश फैलाया है। इसी धरती पर उत्पन्ना हुए ऋषि-महर्षियों ने अपनी वर्षों की कठिन साधना से अजिर्त ज्ञान-विज्ञान की अमृतमयी सरिताओं को प्रवाहित कर जन-जन में सत्य की साधना को पनपाया है। इस देश में उत्पन्ना हुए ऋषि-मुनियों एवं नर-पुंगवों ने ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के उद्घोष को हृदयंगम कर अपने क्रियाकलापों से इस देश की आर्यवर्त, भारतवर्ष आदि संज्ञाओं को सार्थक किया है। उसी का यह सुफल है कि जहाँ यूनान मिस्र रोम एवं प्राचीन संस्कृतियाँ शोधकर्ताओं के अन्वेषण की विषय वस्तु बनकर रह गई है वहाँ आज भी अपने दार्शनिकों एवं महर्षियों की महान् देन को हृदय मन्दिर में बसाये सर्वोन्नात भाल उठाये विश्व का यह संदेश दे रहा है कि - संसार के पथभ्रष्ट लोगों! तुम्हारी समस्याओं का निदान तुम्हारे कल्याण का मार्ग कोरे भौतिकवाद से न होकर सर्वांगीण विकास कराने में समर्थ उदात्त वैदिक दर्शन द्वारा ही सम्भव है। इन्हीं महापुरुषों की श्रृंखला की कड़ी में मानवता का उद्धार करने तथा उसके समक्ष सत्यपथ प्रदर्शित करने हेतु महान् उद्देश्यों को लेकर ५ वर्ष पूर्व वैदिक वेदमन्त्रों के साथ पूज्यपाद स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी ने इस संस्था की स्थापना की जो कि आज अपनी ध्येय की ओर अग्रसर है। यह संस्था उत्तर प्रदेश के अन्तर्गत दिल्ली-पलवल मार्ग से अलीगढ़ की ओर जाने वाली सड़क पर अलीगढ़ जनपद की खैर तहसील के अन्तर्गत गोमत नामक गाँव में प्राचीन राधाकृष्ण मन्दिर के श्रीचरणों में पल्लवित हो रही है।

कार्यप्रणाली तथा प्रवृत्तियाँ-

विद्यार्थियों को साक्षर बनाना मात्र ही उद्देश्य नहीं है अपितु ज्ञान और चरित्र का अद्भुत सम्मिश्रण उनके जीवन में परिलक्षित हो, इसी लक्ष्य को लेकर यहाँ की समस्त व्यवस्था परिचालित होती है। गुरुकुल में एक साथ निवास करते हुए एक समान वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान अथवा आचरण करते हुए विद्यार्थियों के मन में धनी अथवा निर्धन के भेद-भाव की लेशमात्र भी भावना शेष नहीं रहती है। यह यहाँ की कार्यप्रणाली की एक उल्लेखनीय विशेषता है। विद्यार्थियों में बौद्धिक विकास के अतिरिक्त शारीरिक विकास के लिए भी व्यायाम आदि की नियमित व्यवस्था है। बौद्धिक तथा शारीरिक विकास के साथ-साथ विद्यार्थियों को आत्मिक उन्नाति के लिए ईश्वरोपासना सन्ध्या हवन आदि छात्रों की दिनचर्या का एक अभिन्ना अंग है।

ब्रह्मचारियों के दूध के लिए सुचारु व्यवस्था करने के लिए एक गोशाला का निर्माण भी किया गया है। जिसमें दूध देने वाली सुन्दर गायें तथा बछड़े आदि हैं। इस संस्था के पास ५१ बीघा भूमि है जिसमें ब्रह्मचारियों के लिए अन्नाफल एवं शाक सब्जी आदि का उत्पादन किया जाता है। वर्तमान में इस गुरुकुल के विकास हेतु भवनों आदि का निर्माण कार्य प्रगति पर है। गुरुकुल का वार्षिकोत्सव प्रदेशीय जनता के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र होता है। हजारों की संख्या में लोग धर्मलाभ प्राप्त करते हैं।

इस गुरुकुल के प्रथम आचार्य गुरुकुल पौन्धा देहरादून के स्नातक आचार्य अरविन्द कुमार रहे तथा दूसरे आचार्य के रुप में स्वामी श्रद्धानन्द जी वर्तमान में कार्य कर रहे हैं।

इस प्रकार गुरुकुल का एक एकपक्ष सामाजिक उन्नाति के लिए भी निरन्तर प्रगतिशील रहता है। इस प्रकार यह संस्था  समाज तथा राष्ट्र की उन्नाति में सतत संलग्न है स्वामी प्रणवानन्द जी के आशीर्वाद की छाया में अपने प्राप्य लक्ष्य की ओर अहर्निश अग्रसर है।

पता: श्रीकृष्ण आर्ष गुरुकुल,(देवालय) गोमत,

जिला-अलीगढ़  (उ.प्र.)

चलभाष:- 09868855155