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राष्ट्रिय—एकता एक चिंतन–शिवदेव आर्य
किसी भी राष्ट्र के लिये राष्ट्रिय एक ता का होना अत्यन्त आवश्यक है। राष्ट्रिय एकता राष्ट्र को सशक्त व संगठित बनाये रखने की अनन्य साधिका है। राष्ट्रिय एकता विभिन्नताओं में एकता स्थापित करने की व्यवस्थापिका है।….और पढ़ें

श्रावणी उपाकर्म विमर्श – शिवदेव आर्य
भारतवर्ष पर्वों का देश है, नित नूतन पर्वों का उल्लास यहॉं मनाया जाता है। भारतीय पर्व परम्परा में सर्वोत्तम व उत्कृष्ट पर्व का स्थान श्रावणी उपाकर्म को दिया जाता है। क्योंकि यह लोगों को ज्ञान से आलिप्त करने का पर्व है।….और पढ़ें

प्राचीन शिक्षा पद्धत्ति पर संचालित गुरुकुल पौन्धा एवं इसका उत्सव – मनमोहन कुमार आर्य
मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपनी आत्मा की उन्नति करे। आत्मा की उन्नति ज्ञान की प्राप्ति एवं तदवत् आचरण करने से होती है। शारीरिक उन्नति के पश्चात ज्ञान की प्राप्ति करना कर्तव्य है। सद्ज्ञान की प्राप्ति वेद व वैदिक शिक्षाओं को जानने वा पढ़ने से ही होती है। इसके साधन मुख्यतः गुरूकुलीय शिक्षा है जहां स्नातक बनकर ब्रह्मचारी वैदिक शास्त्रों को जानने व समझने की योग्यता प्राप्त कर लेता है….और पढ़ें

स्त्री व शूद्र शिक्षा के सन्दर्भ में सत्यार्थप्रकाश का मत— शिवदेव आर्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती जी अनिवार्य शिक्षा का समर्थन करते हैं और इसके लिए स्वामी जी यह दायित्व माता-पिता को सौंपते हैं। वे चाणक्य के उस प्रसिद्ध श्लोक – ‘माता शत्रुः पिता वैरी…’ को उद्धृत कर यह स्पष्ट कर देते हैं कि जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को प्रशिक्षित नहीं किया उन्होंने अपने सन्तानों के साथ शत्रुवत् व्यवहार किया है….और पढ़ें

आर्यसमाज का उद्देश्य संसार का उपकार करना –मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून
मनुष्य समाज की एक इकाई है। मनुष्य का अभिप्राय स्त्री व पुरुष दोनों से होता है। इन दोनों के समूहों से मिल कर समाज बनता है। समाज का अर्थ होता कि सभी मनुष्य स्त्री व पुरुष परस्पर समान अथवा बराबर हैं। पृथिवी के किसी भूभाग पर समाज के द्वारा ही देश का निर्माण हुआ है…..और पढ़ें

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