श्रावणी उपाकर्म विमर्श – शिवदेव आर्य

श्रावणी उपाकर्म विमर्श – शिवदेव आर्य

भारतवर्ष पर्वों का देश है, नित नूतन पर्वों का उल्लास यहॉं मनाया जाता है। भारतीय पर्व परम्परा में सर्वोत्तम व उत्कृष्ट पर्व का स्थान श्रावणी उपाकर्म को दिया जाता है। क्योंकि यह लोगों को ज्ञान से आलिप्त करने का पर्व है।
इस पर्व की परम्परा आज से नहीं अपितु प्राचीन काल से निरन्तर चली आ रही है। प्राचीन काल में श्रावणी मास में वर्षा के प्रारम्भ हो जाने के कारण ऋषि-मुनि पर्वतों की कन्दराओं से बाहर निकल कर यत्र-तत्र जाकर वेदों का प्रचार-प्रसार, स्वाधयाय के लिए लोगों को जागरूक करना, बडे़-बड़े यज्ञों का आयोजन आदि कार्यों को सम्पादित किया करते थे। यह समय लोगों के लिए अत्युपयुक्त रहता है, क्योंकि प्राचीन काल से ही भारतवर्ष एक कृषि प्रधान देश रहा है। वर्षा ऋतु के कारण कृषक एवं अन्य मनुष्य प्रायः अवकाश से युक्त होते हैं।
प्रथम तो यह विचारणीय है कि इस पर्व का नाम श्रावणी क्यों रखा गया, इसका उत्तर हमें यूं प्राप्त होता है कि यह समय श्रवण नक्षत्र से युक्त पूर्णिमा का होता है, अतः यह श्रावणी है। इसी श्रावणी पूर्णिमा के आधाार पर ही इस मास का नाम श्रावण मास रखा  गया।
यथार्थ में इस पर्व का नाम श्रावणी उपाकर्म है, जिसका उल्लेख ऋग्वेदीय पारस्कर गृह्यसूत्र में प्राप्त होता हैं – ‘अथातोऽधयायोपकर्म….’  (पा- २/१०/१-२) यह पर्व विशेषतः ज्ञान-विज्ञान के गूढ़तम रहस्यों के द्योतन का है। श्रावणी पर्व का आरम्भ विभिन्न ग्रन्थों के अन्वेषण के पश्चात् ज्ञात हुआ कि इस पर्व का प्रारम्भ श्रावण मास की शुक्ल पूर्णिमा से होता है, जिसे श्रावणी उपाकर्म कहते हैं तथा इसकी सम्पूर्ति पौष मास की शुक्ल पूर्णिमा को होती है, जिसे उत्सर्जन कहा जाता है।
इस विशेष ज्ञान चर्चा के काल की समयावधि मनुस्मृति के आधार पर लगभग १४८ से १६५  दिन तथा पारस्करगृह्यसूत्र के अनुसार लगभग १४९ से १६॰ दिन की होती है। इसके लिए पारस्कर गृह्यसूत्र का प्रमाण प्राप्त हाता है – अथातोऽध्यायोपाकर्म। ओषधीनां प्रादुर्भावे श्रवणेन श्रावण्यां पौर्णमास्यां श्रावणस्य पंंचमीं हस्तेन वा। (पा-गृ–२/१॰/१-२) तथा पण्डित चन्द्रमणि विद्यालप्रार तथा पण्डित गंगाप्रसाद उपाधयाय के मनुस्मृति भाष्य का प्रमाण प्राप्त होता है –

                                          श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाप्युपाकृत्य यथाविधिा।
                                      युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान् विप्रोऽर्धप´चमान्
                                              पुष्ये तु छन्दसां कुर्यात् बहिरुत्सर्जनं द्विजः।
                                                              माघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वाह्णे प्रथमेऽहनि॥ – मनु.- 4/95-96

इन सबके अवलोकन से ज्ञात होता है कि ऋषि-मुनि इस कालावधि पर समाज में आकर पण्डित अथवा जन सामान्य वर्ग से ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी चर्चा-परिचर्चायें किया करते थे किन्तु काल की गति से ग्रसित होकर लोग इस पर्व की समयावधि को कम करके वर्तमान में एक दिन का उपलक्षण मात्र कर दिया गया है, जिसकी पुष्टि वर्तमान को प्रत्यक्ष देखने से हो जाती है।
वर्तमान समाज ने उपाकर्म एवं उत्सर्जन का नाम ही भुला दिया है। अब केवल मात्र यह पर्व श्रावणी के नाम से प्रसिद्ध है।
यह पर्व उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार के लिए भी जाना जाता है, क्योंकि उपनयन धारण करने के उपरान्त ही वेदादि ग्रन्थों का विधिवत् अध्ययन आरम्भ होता है।
मध्यकाल में इस पर्व की परम्परा ने विविध रूपों को धारण किया, जैसे – सर्पों की बलि देना, नदी वा तालाब पर जाकर पंचगव्यप्राशन एवं स्नान आदि करके इस पर्व की पूर्णता समझी जाती थी। यह परम्परा भी कुछ काल तक चलती रही, इसके पश्चात् अब वर्तमान का प्रचलन इस प्रकार है कि  गुरुकुलों में, शिक्षण-संस्थानों में विद्यारम्भ का दिवस इस पर्व को माना जाता है। तथा इसी दिवस नूतन विद्यार्थियों का उपनयन संस्कार भी कराया जाता है। विभिन्न स्थानों पर वेदपारायण जैसे महायज्ञों का आयोजन कराया जाता है, स्वाध्याय शिविरों का आयोजन होता है, वेद स्वाध्याय सप्ताह एवं संस्कृत दिवस व संस्कृत सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। कुछ शोधाज्ञों का मानना है कि इसी दिवस वेद का ज्ञान प्राप्त हुआ, किन्तु इसका स्पष्ट प्रमाणपूर्ण ज्ञान कहीं नहीं मिलता है। कहीं-कहीं घर की सि्त्रयॉं अपने घर की दीवारों पर गेरुंआ आदि रंग से श्रावण की मूर्तियॉं बनाकर सेवियॉं का भोग लगाती हैं । राजपूत काल में कन्याओं ने अपनी रक्षा के लिए वीरों के हाथ रक्षासूत्र बॉंधाने की परम्परा को जन्म दिया। यह रक्षासूत्र अबला कन्या जिस वीर को बॉंध देती थी वह वीर उस कन्या का भाई बन उसकी रक्षा के लिए सदैव उद्यत रहता था। कन्या केवल भाई को ही रक्षासूत्र नहीं बॉंधती थी अपितु अपनी रक्षार्थ किसी वीर, पिता तथा अपने पति को बॉंधने का उल्लेख हमें इतिहास को देखने से प्रतीत होता है। इस परम्परा का सम्बन्ध महारानी कर्णवती गुजरात के बादशाह से अपने राज्य की रक्षार्थ मुगल बादशाह हुमायॅूं को रक्षासूत्र भेजने से भी लिया जाता है।
यह पर्व हम सबके जीवन को आनन्द से विभोर करने का पर्व है। स्वाध्याय को अपने जीवन का अंग बनायें। हमारे जीवन से स्वाधयाय बिल्कुल समाप्त हो गया है। आज आवश्यकता है कि हम अपने स्वाधयाय को अधिाक से अधिाक बढ़ायें, जिससे हम सत्य अर्थात् निणर्यात्मक ज्ञान को प्राप्त हो सकें। इस पर्व को मनाने की तभी सार्थकता होगी जब हम अपने लिए संकल्प करें कि हम अपने जीवन के व्यस्ततम काल में से कुछ  काल को नित्यज्ञान के देने वाले वेदादि शास्त्रों का प्रतिदिन स्वाधयाय करके अपने जीवन में धारण  करेंगे…..                                                                                                                           

– गुरुकुल पौन्धा, देहरादून
मो.-8810005096